जीवन में मिठास घोलने वाली पाती की लुप्त होती विधा

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Dr. Suraj Singh Negi
Dr. Suraj Singh Negi

अपने मनोभावों को शब्दों में पिरोकर दूसरे तक सम्प्रेषण करने की विधा खत (चिठ्ठी) या पत्र लेखन कहलाती है। जिसमें उन विचार-भावों का समावेश होता है जिन्हें समक्ष प्रकट नहीं किया जा सकता है। सीमित व सारगर्भित शब्दों में अपने मनोभाव, विचार, संकोच, लज्जा, पश्चाताप, स्वीकारोक्ति, नसीहत, उलाहना, संदेश, सूचना सहित अन्य का प्राकटय रूप खत (चिठ्ठी) या पत्र लेखन की आत्मा होती है। सभ्यताओं के साथ मानव के क्रमिक विकास के इतिहास में झांके तो जबसे लेखन पद्धति प्रचलन में आई होगी तभी से अपनी अभिव्यक्ति को दूसरे तक पहुंचाने के लिए इस विधा का प्रयोग किया जाता रहा है। एक दौर में खत (चिठ्ठी)पाती या पत्र लेखन के माध्यम से ही सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाता था तथा दशकों तक यह प्रयोग भारतीय जनमानस पर छाया रहा। यहां तक कि भारतीय सिनेमा जो मनोरंजन का सबसे बडा व सशक्त माध्यम रहा में भी सैंकडों गीत लिखे गए जिसमें खत, पाती या पत्र को आधार बनाया गया तथा जिनका जादू आम लोगों के सिर चढक़र बोला। सूचना एवं प्रोद्योगिकी के विकास व दूरसंचार के बढते संसाधनो के बाद यह विधा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। वर्तमान में कमजोर होते मानवीय सम्बन्धों में रिश्तों की मिठास घोलती इस विधा का प्रयोग ना के बराबर हो गया है तथा शिक्षा प्रणाली में भी अब इस विधा की महत्ता पर जोर नहीं दिया जा रहा है। इसी बीच एक प्रशासनिक अधिकारी ने नवाचार करते हुए इसके प्रयोग व इसके महत्व को उजागर किया है।

लुप्त होती पाती लेखन विधा को पुनर्जीवित करने में रत एक प्रशासनिक अधिकारी-

एक दौर में संदेशों का आदान प्रदान पत्रों के माध्यम से होता था। परदेश गए अपनों के पत्रों का बेसब्री से इंतजार हुआ करता था। इधर संचार क्रान्ति के पश्चात संदेश के इस माध्यम की महक जैसी फीकी पडने लगी। पिछले पन्द्रह-बीस वर्षों से मोबाईल क्रान्ति, उसके बाद सोशल मीडिया पर बढ़ती सक्रियता ने तो पत्र लेखन विधा को ग्रहण ही लगा दिया है। वैश्वीकरण के दौर में आज पूरी दुनिया जहां एक विलेज बन चुकी है, लेकिन यहां हर एक शख्स तन्हा है। पिछले दशक में सर्वाधिक प्रभाव यदि किसी पर हुआ है तो वह है हमारे अपनों के साथ संबंध संबंधों में आए इस बिखराव को रोकने के लिए राजस्थान प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और वर्तमान में अतिरिक्त जिला कलक्टर सवाई माधोपुर डॉ. सूरज सिंह नेगी पाती लेखन विधा को जीवन्त बनाने और पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं।

डॉ. नेगी ने वर्ष 2018 में पाती अपनों के नाम से एक छोटे से अभियान की अलख जगाई, जिसमें आज देश-विदेश के 600 से अधिक प्रबुद्धजन एवं अनेक राज्यों में अध्ययनरत लगभग 6000 स्कूली बच्चे जुड़ चुके हैं। पढऩे-सुनने में जरूर अविश्वसनीय लगे लेकिन यह हकीकत है। देश के प्रख्यात मैनेजमेन्ट गुरु एन. रघुरामन ने 3 फरवरी 2020 के मैनेजमेन्ट फंडा कॉलम में डॉ. नेगी की पाती मुहिम पर पूरा आर्टिकल लिखा। डॉ. नेगी के पाती लेखन मुहिम में उनका साथ दे रही है, उनकी पत्नी डॉ. मीना सिरोला जो शिक्षा संकाय वनस्थली विद्यापीठ में एसोसिएट प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं। नेगी दम्पति द्वारा चलाई गई इस विशेष एवं अनूठी मुहिम में अब तक अनेक अखिल भारतीय स्तर की पाती लेखन प्रतियोगिताएं सम्पन्न करवाई जा चुकी हैं, जिनमें गुरु की पाती शिष्य को, संतान की पाती माता-पिता को,  पत्र मित्र को, प्रकृति की पाती मानव को, पत्र अपनों को, एक पाती दादा-दादी, नाना-नानी की यादों के नाम, एक पाती शिक्षक को प्रमुख हैं। इसके अलावा टोंक जिले के टोडारायसिंह में अप्रैल 2019 में 125 बच्चों से बाल-विवाह रोकथाम के लिए माता-पिता के नाम पत्र लिखवाकर उन तक पहुंचाए गए। मई 2019 में 350 बच्चों द्वारा मताधिकार मेरा अधिकार क्यों करें इससे इन्कार विषय पर अपने अभिभावकों को पत्र लिखे गए नवम्बर 2019 में 600 स्कूली बच्चों ने सिंगल यूज पॉलिथिन को नो तथा जल संरक्षण पर पत्र लिखकर अभिभावकों तक पहुंचाया गया। सरवाड़ एसडीएम रहते हुए 14 फरवरी 2018 को वेलेन्टाईन डे के अवसर पर माँ तुम कैसी हो विषय पर पाती लेखन करवाया गया, जिसमें सरकारी कार्मिक से लेकर व्यवसायी, स्कूली बच्चे, जनप्रतिनिधि शामिल हुए। लगभग 500 प्रतिभागियों को मों के नाम पत्र लिखते समय भावुक होता हुआ देखा गया। नवम्बर 2018 में एडीएम बूंदी के पद पर तैनात डॉ. नेगी ने बूंदी महोत्सव के दौरान मैं बूंदी हूं विषय को केन्द्र में रखकर पत्र लिखवायें, इन पत्रों के माध्यम से आमजन को बूंदी के इतिहास, कला, संस्कृति साहित्य से रूबरू होने का मौका मिला।पाती मुहिम के शीर्षक पाती अपनों को बारे में पूछने पर उन्होंने अवगत कराया कि आज के दौर में सर्वाधिक कठिन काम यदि है तो वह है अपनों को समझना, एक छत के नीचे रहते बरसों बीत जाते हैं लेकिन एक-दूसरे की भावनाओं, दिल की पुकार को नहीं समझ पाते, आज रिश्ते नाम मात्र के रह गए हैं। वहीं अपनापन और आत्मीयता तो जैसे है ही नहीं। ऐसे में अपनों भावनाओं को सम्प्रेषित करने का एक सशक्त माध्यम है पत्र लेखन।परिणाम बहुत सुखद रहे है, आज अनेक लोग बच्चों को प्रतिदिन एक पत्र लिखने लगे हैं, जन्म दिवस पर दिए जाने वाले महंगे गिफ्ट के स्थान परिणाम बहुत सुखद रहे हैं, आज अनेक लोग अपने बच्चों पर अब पत्र दिये जाने लगे हैं, जिन स्कूली बच्चों ने कभी पोस्ट कार्ड, लिफाफे-अन्तर्देशीय पत्र नहीं देखें, वह प्रत्येक पाती प्रतियोगिता में पत्र लिख रहे हैं। टोडारायसिंह के 35 स्कूलों के 1500 बच्चों ने अपनो के नाम फरवरी 2020 में पत्र लिखें, जिनमें से 91 पत्रों का संकलन बच्चों के पत्र नाम से पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। सात समन्दर पार से पत्र होने लगे हैं।खास बात यह है कि प्रत्येक प्रतियोगिता में शामिल पत्रों का मूल्यांकन विशेषज्ञों से करवाया जाता है। प्रत्येक प्रतिभागी को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है और चयनित पत्रों की पुस्तक प्रकाशित करवाई जाती है। अब तक मां की पाती बेटी के नाम, पत्र पिता के, बच्चों के पत्र नाम से पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, पाती मित्र को, प्रकृति की पुकार तथा एक पाती शिक्षक को पुस्तकें प्रकाशनाधीन है।

साहित्य को समर्पित डॉ. नेगी-पत्र विधा को जीवन्त बनाने के अलावा डॉ. नेगी साहित्यधर्मी भी है। अब तक पापा फिर कब आओगे कहानी संग्रह के अतिरिक्त रिश्तों की आंच, वसीयत, नियति चक्र, ये कैसा रिश्ता शीर्षक से उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। रिश्तों की आंच का उर्दू में एवं नियति चक का अनुवाद राजस्थानी भाषा में हो चुका है। ये कैसा रिश्ता का अनुवाद अन्य भाषाओं में हो रहा हैं। सृजन के लिए राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त कर चुके डॉ. नेगी की रचनाओं के केन्द्र में आम व्यक्ति, जीवन मूल्य, मानवीय संवेदनाएं, प्रकृति चित्रण प्रमुख है। डॉ. नेगी की रचनाओं पर विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हो रहा है। हाल ही में रेनू बाला, रोहतक (हरियाणा) द्वारा लिखित डॉ. सूरज सिंह नेगी की रचनाओं के विविध पहलू शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित हुई है।शिक्षा में नवाचार पर जोर-डॉ. नेगी ने टॉक एवं अजमेर में कार्यरत रहते हुए अनेक विद्यालयों को न सिर्फ गोद लिए अपित उनमें कई नवाचार भी करवाए जिनमें स्टार ऑफ द क्लास, स्टार ऑफ द स्कूल, मेरा कोना सबसे अच्छा, आओ पेड गोद लें, इनसे मिलिए इनको जानिए, आओ लेख सुधारे प्रमुख हैं।डॉ. नेगी लोगों की सोई हुई संवेदनाओं को जाग्रत कर रहे हैं एवं स्कूली बच्चों के बीच में जाकर उनको एक अच्छा नागरिक एवं संवेदनशील इंसान बनाने में रत हैं। इसका आधार बनी है पाती मुहिम और शिक्षा में नवाचार

जीवन परिचय

 

नाम डॉ. सूरज सिंह नेगी

जन्मतिथि  17.12.1967 जन्म स्थान नैकाना, अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड

शैक्षणिक योग्यता एम.कॉम (प्रथम श्रेणी), एम.फिल ( प्रथम श्रेणी), ए क्रिटिकल अप्रैजल ऑफ इंडस्ट्रियल डवलपमेन्ट ऑफ राजस्थान विषय पर राजस्थान विश्वविद्यालय से वर्ष 1994 में डॉक्टरेट

प्रकाशित साहित्यिक रचनाएं :

  1. पापा फिर कब आओगे (कहानी संग्रह ) 2016 2. रिश्तों की आंच (उपन्यास) 2016
  2. रिश्तों की आंच (उपन्यास) उर्दू संस्करण 2017 4. वसीयत (उपन्यास) 2018
  3. नियति चक्र (उपन्यास) 2018 6. ये कैसा रिश्ता (उपन्यास) 2021 7. साहित्य कुन्दन (साझा संग्रह) में आलेख प्रकाशन 2018
  4. मां की पाती-बेटी के नाम सम्पादन 2019
  5. पत्र पिता के नाम सम्पादन 2020 10. साँझ के दीप (कहानी संग्रह) सम्पादन 2020
  6. पत्र अपनों को सम्पादन 2020 12. दुनिया घुटनों पर-लॉकडाउन 2020 में आलेख प्रकाशन

पुरस्कार

साहित्यिक गतिविधियों के लिए

> साहित्य सेवा के उत्कृष्ट लेखन हेतु फाकिर एजाजी अवार्ड 2018 > साहित्य सेवा के लिए- डॉ. दुर्गालाल सीमानी पुरस्कार 2016

> साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय ज्योतिष संस्था नई दिल्ली चैप्टर टोंक द्वारा मनुस्मृति सम्मान 2016 2017

> साहित्य सेवा के लिए मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य सम्राट पुरस्कार 2017 > साहित्य सेवा के लिए उपेन्द्र नाथ अश्क पुरस्कार 2019

राजकीय सेवा निर्वहन के लिए

> वर्ष 2005 में उपखण्ड स्तरीय सम्मान

> वर्ष 2003 एवं 2015 में श्रेष्ठ कार्य सम्पादन के लिए गणतंत्र दिवस पर जिला स्तरीय सम्मान

विद्यार्थियों ने लिखी पाती अपने प्रियजनों के नाम: प्रधानाचार्य गिरधर सिंह

राज उच्च माध्यमिक विद्यालय मालपुरा के छात्र छात्राओं ने साहित्यकार व गुरू ( सवाईमाधोपुर)डॉ सूरज सिंह नेगी की प्रेरणा व प्रधानाचार्य गिरधर सिंह के निर्देशन में अपने प्रियजनों को पत्र लिख कर अपनी भावनाओं और विचारों को शब्दों में पिरोया है। पाती लेखन के पीछे मूल भावना आज के मोबाईल युग मे उस परंपरा को पुनर्जीवित करना है जो अब विलुप्त सी हो गयी है। प्रियजनों को पत्र लिखना अब लगभग बंद सा हो गया है। इस सार्थक प्रयास से बच्चों की मौलिकता, रचनात्मकता, और सृजनशीलता का विकास करना है जो अब पीछे छूटती जा रही है।  राजकीय उमा विद्यालय मालपुरा के प्रधानाचार्य गिरधर सिंह ने बताया कि लगभग 150 छात्र छात्राओं ने अपने प्रियजनों को पत्र लिखा। जिसमें विजेता रहे प्रतिभागियों को पुरूस्कृत किया गया। इस प्रतियोगिता के आयोजन से विद्यार्थियों में इतना उत्साह देखा गया तथा उन्होंने रूचिपूर्वक इस प्रतियोगिता में भाग लिया तथा समय समय पर ऐसे आयोजनों की आवश्यकता जताई।

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